ज़िंदगी "एक पहेली"

ज़िंदगी....
कितनी अजीब है न....?
कभी दोस्त बनकर मुश्किलों से लड़ना सिखाती है तो कभी दुश्मन बनकर मुश्किलों को ही बढ़ाती है.... गर मेहरबां हो जाए तो ग़म की परछाईं भी पास नहीं आती, मगर रूठ जाए तो आंसुओं के सैलाब में पूरी उम्र डूब जाती है।
ज़िंदगी...., एक गुरु भी है, जिसका सिखाया हुआ हर सबक हमारे लिए आने वाली मुश्किलों को आसान करने में मदद भी करता है।
खैर, देखा जाए तो हर इंसान के लिए इसके अलग-अलग मायने हैं....अंजाम हैं और मक़ाम भी अलग-अलग ही हैं....।
मेरे लिए....ये ज़िंदगी, जैसे एक पहेली बनकर खुद मेरे साथ खेल रही है। जिस किसी भी रस्ते पर कदम बढ़ाता हूं.... अक्सर मुझे किसी नई पहेली में फंसाकर मुझ पर हंसने लगती है, मानो मुझसे कह रही हो कि तुम्हे इस हालत में देखकर अच्छा लग रहा है....।
यकीन मानिए, ज़िंदगी के ऐसे पहलुओं को देखकर मेरे मन में अक्सर बहुत से सवाल आने लगते हैं कि आखिर क्यूं मेरे नसीब में इतने दर्द और ग़म लिखे गए हैं? क्यूं मुझे खुशियों के लिए तरसना पड़ता है? क्यों.....?
कभी कभी सोचता हूं कि आख़िर कितनी ज़ोर से चीखूं कि मेरे सारे ग़म सबको सुनाई दे? मगर क्या करूं, ऐसा करके भी कोई फायदा नही है। दुनिया में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं, जो दूसरों के ग़मों को बांटते हैं, उनकी बातों को सुनकर उन्हें अपनी तकलीफों से लड़ने के लिए जगाते हैं, समझाते हैं, ताकि उनकी हिम्मत एक बार फिर से कोशिश करे ज़िंदगी से लड़ने के लिए।
देखा जाए, तो ज़िंदगी किसी जंग से कम नही है। हर कोई इस ज़िंदगी से, अपने-अपने तरीके से, अलग-अलग मक़ाम हासिल करने के लिए लड़ रहा है और बस लड़ता ही जा रहा है....। हर किसी के लिए इस लड़ाई का अपना एक अलग कारण भी है....कोई जीतने के लिए लड़ रहा है, तो कोई जीतने के बाद भी लड़ रहा है मगर वो क्यों लड़ रहा है,  क्या हासिल करना चाहता है....इस सवाल का जवाब शायद उसके पास नही है क्योंकि उसने हमेशा दुनिया को ज़िंदगी से लड़ते हुए देखा है शायद इसलिए वो भी इस लड़ाई में शामिल हो गया।
अक्सर इसी लड़ाई के दरमियां हम ज़िंदगी के असली मतलब से दूर हो जाते हैं, हम भूल जाते हैं कि जिस लड़ाई को हम लड़ रहे हैं उसका अंजाम क्या होगा...? भूल जाते हैं उन छोटी-बड़ी बातों को, उन लम्हों को, जिनसे ज़िंदगी का असली मतलब जुड़ा हुआ है।
ज़िंदगी का असली मतलब खुशियाँ हैं। ज़िंदगी की छोटी से छोटी बातों में भी खुशियाँ छिपी होती हैं। खुशियाँ वो नहीं जो सिर्फ हमे मिले.... खुशियाँ तो वो हैं, कि जब किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए, हम अपने ग़म और दर्द को, कुछ वक्त के लिए भुलाकर उसे बहलाने की कोशिश करते हैं....और जिस पल में उसके चेहरे पर मुस्कान आती है, बस....उसे देखकर जब अनायास हमारे होंठों पर भी हल्की-सी मुस्कुराहट आती है, तो वही है ज़िंदगी का असली मतलब....। ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव का क्रम बहुत ही अजीब है.... मगर हर लम्हें में जब इंसान दूसरों को खुशियां बांटने की कोशिश करता है तब उसे भी परमानन्द मिलता है।
हो सके, तो कभी किसी उदास से चेहरे पर खुशियां बांटकर देखना.... उस वक्त हमारे अंतर्मन में जो शांति और सुकून के भाव आते हैं....वही ज़िंदगी के असल मायने भी हैं।

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