मिज़ाज़-ए-नवाबी

दोस्तों,
कभी कभी, ऐसा भी हो जाता है, कि जब हम कुछ लिखने के लिए कलम उठाते हैं तो अक्सर लफ़्ज़ कम पड़ जाते हैं।
समझ में नहीं आता कि कहां से शुरू करूं....
कहने को तो बहुत कुछ होता है मेरे मन में, जिसे मैं बयां करना चाहता हूं, मगर लफ़्ज़ हैं कि वो बाहर नहीं आना चाहते....
ऐसे में खुद पर गुस्सा भी आता है और हैरानी भी होती है। कभी कभी तो आंसू भी आ जाते हैं इन आंखो में।
मगर, इस वक्त तो खुद पर हैरानी हो रही है, क्योंकि लफ़्ज़ तो कम थे, फिर भी इतना सब कुछ कैसे लिखा हमने आप सबके लिए? ये....एक अजनबी सी पहेली ही है, मेरे लिए............

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