बेमौसम बारिश

ये बेमौसम बारिश......उफ्फ!
कितना परेशान करती है।
देर रात साढ़े तीन बजे से पूरे एरिया की लाइट गई हुई है, अभी तक कोई अता-पता नहीं है कि कब आएगी। बिजली विभाग के हेल्पलाइन नंबर पर बात की तो वहां से भी कोई अच्छा जवाब ना मिला कहने लगे कि आपके क्षेत्र में बारिश की तेजी को देखते हुए लाइट की सप्लाई रोक दी गई है, जैसे ही बारिश बंद होगी वैसे ही आपके क्षेत्र की लाइट की सप्लाई शुरू कर दी जाएगी, तब तक आपको इंतजार करना पड़ेगा। ये सुनकर और भी ज्यादा गुस्सा आने लगा कि ऐसी बेमौसम बारिश का क्या फायदा कि कहीं आना-जाना भी ना कर सको, सारे काम छोड़-छाड़ कर बस घर में ऐसे ही बैठे रहो। दोपहर का वक़्त शुरू होने वाला है, सुबह के बारह बजने वाले हैं। अभी और कितना इंतजार करना पड़ेगा लाइट आने का? ये सब सोच सोचकर मन ही मन गुस्सा हो रहे थे हम।
इस बेमौसम बारिश की वजह से पिताजी आज अपने ऑफिस नहीं जा पाए, माताजी रोजमर्रा के काम नहीं कर पा रहीं, और बड़े भैया, वो अपनी दुकान नहीं जा पा रहें हैं। ख़ैर इस बीच बड़े भैया का फोन बजा और दुकान के ग्राहक इस बेमौसम बारिश में भी सामान खरीदने के लिए उनसे निवेदन करने लगे और बड़े भैया भी इस बारिश में भीगते हुए ग्राहकों को सामान पहुंचाने निकल पड़े।
अब घर में हम तीन सदस्य बचे हैं, और सभी रजाई ओढ़े सर्दी से राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं। पिताजी और माताजी यूं ही बातें कर रहे थें कि ना जाने पिताजी को क्या बात याद आ गई और वो इस बेमौसम बारिश से जुड़ा अपने जीवन का एक किस्सा सुनाने लगें कि कैसे उनके बड़े भैया की शादी के समय अचानक ऐसी ही बेमौसम बारिश होने से बारात को बीच रास्ते में दिक्कत हुई थी, और सब लोग यहां-वहां भागने लगे थे। इतना बताते हुए पिताजी और माताजी ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। फिर माताजी ने भी अपने जीवन के ऐसे ही एक बेमौसम बारिश का किस्सा सुनाया कि कैसे उनकी सहेली की शादी में भी अचानक बारिश होने से सभी मेहमानों को बड़ी दिक्कत हुई थी और सभी मेहमान उस शादी के कार्यक्रम में बुरी तरह भीग गए थे। ये सब वाक्ये कहते-सुनते पिताजी और माताजी दोनों ही अपने जीवन के कुछ सुनहरे पलों को फिर से जी रहे थें और मुस्कुरा रहे थें।
ये सब देखकर कितना अच्छा लगता है ना कि घर के सदस्य एक साथ बैठकर अपने जीवन के ऐसे किस्सों को याद करके कुछ देर के लिए ही सही, मगर अपने जीवन में चल रही उथल-पुथल से राहत पाने की कोशिश करते हैं, और कुछ देर एक दूसरे के साथ वक़्त गुजारकर अपने रिश्ते में फिर से एक नयापन लाते हैं।
इन्हीं सब बातों को हम सोच रहे थे कि अचानक हमारा ध्यान टूटा, और पाया कि अब कमरे में एक अजीब सी खामोशी भर गई है, जिसे बयां कर पाना हमारे लिए थोड़ा मुश्किल है। पिताजी की ओर देखा तो वे अपने विचारों में खोए हुए थे, मानों वे सोच रहे हैं कि बेटे की शादी करवानी है, घर की मरम्मत का काम शुरू करवाना है, आने वाले समय के लिए पैसे जोड़ने हैं, बच्चों का जीवन व्यवस्थित करना है, इस बेमौसम बारिश के कारण आज ऑफिस नहीं जा सका, कल ऑफिस जाना है, वहां के काम पूरे करने हैं, पता नहीं और क्या क्या सोच रहे थे पिताजी। दूसरी तरफ माताजी अपने विचारों में डूबी हुई थी कि रात-भर से लाइट गई हुई है, ना जाने टंकी में कितना पानी बचा हुआ है, कब लाइट आएगी, कब पानी भरूंगी, खाना भी बनाना है, कुछ गंदे कपड़े पड़े हुए हैं, उन्हें भी साफ करना है, घर भी ऐसे ही गंदा पड़ा हुआ है। इस बारिश ने तो आज परेशान कर दिया।
इन्हीं विचारों की उधेड़बुन के बीच अचानक कमरे में हल्की सी रोशनी दिखती है और पिताजी कहते हैं, लो भई, लाइट आ गई। इतना सुनते ही माताजी झट-पट रजाई से बाहर निकल गई और जल्दी से पानी की मोटर चलाई और फटाफट झाड़ू लेकर घर की सफाई करने लगीं और कुछ देर बाद पिताजी भी रजाई से बाहर निकल गए और माताजी के साथ घर की सफाई में व्यस्त हो गए। उसके बाद दोपहर का खाना बनाया गया और फिर.......? फिर क्या, वही रोज़ की ज़िंदगी जो पिछले कई सालों से चल रही थी, फिर वैसे ही चलने लगीं।
इन सबके बीच जब हमने खिड़की पर जाकर देखा तो बाहर बारिश कुछ हल्की हो चुकी थी, आसमान में जहां कुछ देर पहले तक सिर्फ काले बादल थे, अब वे कुछ कम हो गए हैं और आंखो में आंसू लिए हम, जहां कुछ देर पहले तक इस बेमौसम बारिश से खीज़ रहे थे, अब खुदा को शुक्रिया अदा कर रहे थे कि आज इस बेमौसम बारिश ने मुझे एक अनजाना सा सबक सिखा दिया कि जीवन की इस भागदौड़ में हम रोज़ नई नई उलझनों में फंसते चले जाते हैं और चाहकर भी खुश नहीं हो पाते। ऐसे में इस बेमौसम बारिश का जीवन में आना बहुत ज़रूरी हो जाता है। ताकि हम सब कुछ पल साथ रहकर अपने रिश्ते को फिर से नया बनाने की कोशश कर सके, और जीवन की उलझनों को कुछ देर के लिए भूलकर दो पल मुस्कुरा सके।
इस सबक को पाने के बाद, जहां एक तरफ अब मेरे अंदर बेमौसम बारिश की शुरुआत हो गई थी, वहीं दूसरी तरफ बाहर जो बारिश रुक सी गई थी, वो बेमौसम बारिश अब फिर से तेज़ हो गई थी। इस बीच पीछे से माताजी की आवाज़ आई, अरे रिशु, क्या कर रहे हो वहां खिड़की पर? चलो, खाना तैयार हो गया है, खा लो।

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